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ज़रा            एक           नज़र        देखो      ना कि
                                                           भोलूवा       की    पाती    मुखमंतरी   के       नाम


आदरनिये मुखमंतरी  महोदय
                                               वालेकुम परनाम। आगे खुसल -मंगल सब अच्छा है लेकिन आपका राज में सब कुछ अछा नहीं चल रहा है। एगो मंत्री सच बोल दिया तो उसको हटा दिए पर ई तो बताइये कि केतना के मुह बंद कीजियेगा ?? एगो पांडे सच बोल दिया तो बली का बकरा बना दिए। बेचारा का गलत बोला था ?? आपका बाबूजी बैठके कोयला का पैसा ले रहे है राजेनर सिंह का बेटा का साथ  ,आखीर आपका बाबूजी ई पइसवा लेके ऊपर जायेंगे का ? कि पैसवे पर सुता के उनको जरायेगा ?? यही अँधाधुंध पैसा का खातीर एगो बेटा  का जान चला गया। एकगो कोयला चोर का पास आपका चाचा का नंबर है। सब सीधे एस पी को बोलता है एस पी तो मानो चपरासी बन गया है ,और IPS लोग भी भडुवन पैसा कमाए खातीर नौकर चपरासी हवलदार दरबान कुछ भी बने वास्ते तईयार है।
   भला बताईये कि आपका राज में डी ज़ी पी अभी तक का सबसे अहमक अधिकारी है ,खाली मुह से ऎ के 47 चलावे वाला ,,आपका राज में अभी तक का सबसे भ्रस्ट चीफ सेक्रेटरी ,,आपका राज में सबसे भ्रस्ट गृह सचिव ,आप बोलते है कि हमरा गठबंधन का सरकार है मज़बूरी है ,सो अपना मन से कुछो नहीं करे पाते है ,,तब आपका खिलाफ दुबे बोला तो उसको हटाने वास्ते ताकत कहा से आ गया ?? इसका मतलब है कि आपका मन खाली चोरी वास्ते करता है इसलिए उसी का नक्से कदम पर चलते है। यही कारन है कि आपका बाप जो दिशोम गुरु का नाम से जाना जाता था आज का डेट में सबसे बड़ा गुस्ख़ोर नेता कहलाने लगा है। यही हाल रहा तो कही चौक चौराहा पर मरे का बाद मूर्ती लगाईयेगा तो आदमी जूता से मारेगा। तनिको लाज़ सरम रखिये साहेब, नहीं तो कल बेटा पोता आंधर लांगड़ निकल जायेगा तब का कीजियेगा ? बाबूजी थोडा बहुत अच्छा करम किये थे तब आपलोग लायक आदमी निकले लेकिन आज तक आप तो कोय अच्छा काम नहीं किये। आपका बाबूजी भर जिंदगी बाहरी भीतरी का लड़ाई लड़ते रहे और मरे के समय में पैसा खातीर आपलोग बाप बेटा दुनो बाहरी लोगो का लिए दरवाज़ा खोल दिए ,कोय मना  करेवाला नहीं रहे तो आपलोग ऑडर पास करवा दीजियेगा कि झारखण्ड में बाल बच्चा भी दूसरा स्टेट का आदमी पैदा करेगा।
   खैर अभी इतना ही
                          आगे आपका
                                                   भोलूवा उर्फ़ भोलानाथ
                                                                                       मासीपीढ़ी
                                                                                                             हज़ारीबाग़ 

पुलिस कप्तानों कि चांदी -चुनाव आयोग ने लूटने कि छूट दी

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         पुलिस कप्तानों कि चांदी -चुनाव आयोग ने लूटने कि छूट दी 

तहलका डेस्क

(टी पी सिंह )
वैसे तो चुनाव आयोग ने चुनाव के मद्देनज़र सभी पोलिस अधिकारियो  को तबादले का आदेश दिया है जो तीन साल से एक ही  जगह जमे है ,पर इसी आड़ में झारखण्ड में सभी कप्तानों कि चांदी कट गयी है ,सभी ढाई सौ थाने खाली हो गए है एक साथ। अब सभी थानो में बोली लग रही है ,क्युकी झारखण्ड में मंत्री से लेकर संतरी तक को लूटने कि खुली छूट मिली है सो सभी कप्तानों के आवास के बाहर भीड़ लगी है ,,धनबाद ,जमशेदपूर ,रामगढ ,बोकारो ,गिरिडीह ,रांची आदी जिलो में चुनिंदा थानो के लिए २० -२० लाखकी बोली लग रही है ,सभी कप्तानों के प्राईवेट दलाल  और सरकारी दलाल भाव में है ,क्युकी सभी कप्तानों के दो दो दलाल है ,एक एक दलाल इसमें दसिओ लाख रुपया कमाने कि जुगत में लगे है ,और हर एस पी कम कम एक करोड़ ,अब यह बात छुपी नहीं है लिहाज़ा मुख्य मंत्री  से DGP तक अपना हिस्सा बटाने कि फिराक में हिसाब लगा रहे है ,डी ज़ी पी और सी एम् के भी दलाल मोबाइल पर व्यस्त है किसको कितना कहा से मिल रहा है ?झारखण्ड में कोई किसी को लूटने से मना नहीं करता है चाहे वह अपराधी ही क्यों न हो ,बस साहब का हिस्सा मिल ज़ाना चाहिए ,यहाँ नक्सलिओं से हिस्सा बटाने में पुलिस को शर्म नहीं आरही है तो पुलिस से मंत्री क्यों शरमाये ?गुंडागर्दी ,कोयला तस्करी ,लोहा तस्करी,ज़मीन कब्ज़ा से लेकर सारे अवैध धंधो को बढ़ावा  दिया ज़ रहा है। बस सबका हिस्सा समय पर मिल जाये। कहते है पूरे झारखण्ड में रसीद कि कमी है पर ज़मीन माफिया जब चाहे जिस जमीन कि रसीद कटवा सकते है ,लोग अपनी ज़मीन पर भी बॉउंड्री नहीं करवा सकते, पोलिस ही रोक देती है क्युकी दलाल जब्तक उन्हें हिस्से कि जानकारी नहीं दिलवा देता तबतक ऐसा ही आदेस चलता रहता है।
       इसी बात को लेकर झारखण्ड पुलिस संघ के अध्यछ ने तहलका से एक मुलाकात में कहा कि चुनाव आयोग ने सही और ईमानदार नज़रिये से यह तबादला आदेश ज़ारी किया है पर उसका दुरुपयोग होगा यह कौन जानता था ,पैसे के बल पर क्रीम से क्रीम जगह पर तबादला हुवा वही तीन साल से नक्सली ज़िले में रहते हुवे भी नक्सली ज़िले में तबादला क्या बताता है ? क्या यहाँ पैसे पैरवी का खेल नहीं हुवा ?नियमो कि आड़ में नियमो को ठेंगा दिखाकर होता है यह तबादला। एक दरोगा रामासिस बैठा को जैसे ही पता चला कि उनका तबादला चतरा  ज़िले के कुंडा में हो गया है उनका हार्ट फेल हो गया और वे वही शहीद हो गए देवघर के बाबा दरबार में। बताते चले कि कुंदा थाना आज भी झारखण्ड सरकार कि बजाय जंगल सरकार के आदेस का तलबगार है। यहाँ केस भी पुलिस ही दर्ज़ करती है कोई दर्ज़ करने नहीं जाता है ,साग सब्ज़ी भी बख्तरबंद गाड़ी में जाता है। यानि एक सप्ताह में झारखण्ड में पुलिस तबादले में पचास करोड़ का गेम हो जायेगा -कुछ प्री पेड़ तो कुछ पोस्ट पेड़ । 

झारखण्ड सरकार का एक और भ्रस्टाचार

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             झारखण्ड सरकार का एक और भ्रस्टाचार 

तहलका डेस्क रांची


घपलो -घोटालो में बनती बिगड़ती ,गिरती उठती झारखण्ड कि सरकार घोटालो से ऊपर नहीं आ पा  रही है,जैराम रमेश कहते है हम भ्रस्टाचार मिटायेंगे। इस बार कृषि मंत्रालय का एक घोटाले कि पृष्ठभूमि तईयार हो गयी है ,१७ -१८ फरवरी को हज़ारीबाग में राज्य स्तर का कृषि मेला लगने जा रहा है ,इस मेले में राज्य भर के किसानो के आने कि बात कही जा रही है ,पर वास्तविकता है कि योजना खाऊ - पकाऊ बनकर सामने आ रही है ,इस कार्यक्रम के लिए हज़ारीबाग़ में स्टेडियम को चुना गया है ,वहाँ के लोगो को बुलाकर राय मांगी गयी थी ,सभी लोगो ने अपनी अपनी सारी बाते बताकर जो स्टेमिट बनाया वह २८ -३० लाख का बना ,कृषि मंत्रालय के तथाकथित ठेकेदार या युँ कहे कि दलाल रांची लौटकर ३० लाख कि योजना को एक करोड़  तीस लाख  का बना दिया। इस काम के लिए वहाँ यानि हज़ारीबाग के स्थानीय लोगो के प्रपोसल को गौण कर दिया गया क्युकी बात लीक हो जाती ,स्थानीय किसानो और स्थानीय लोगो के भलाई की दुहाई देनेवाले मंत्री के चट्टे बट्टे मंत्री से मिलकर रांची के एक ठेकेदार से मण्डवानी कर उसको जिम्मा दे दिया। काम एक करोड़ दस लाख में फाइनल हो गया यानि ८० लाख अधिक में, इसमे से दस लाख ठेकेदार को और ७० लाख मंत्री अधिकारी और उनके रिस्तेदारो को देने के लिए बंदरबाट योजना कि स्वीकृती दे दी गयी ,सोना टेंट हॉउस रांची को योजना का बंदरबाट करने कि ज़िम्मेवारी सौपी गयी है। इसमें दस हज़ार नास्ता का पैकेट चालीस रु प्रती पैकेट ,बाज़ा ,टेंट ,गिफ्ट ,किताब ,कॉपी ,तथा अन्य खर्चे समाहित है। हज़ारीबाग के ज़िला कृषि पदाधिकारी को कहा गया है कि वे मुह नहीं खोले नहीं तो जेल जायेंगे।बिना टेंडर निकाले ही हज़ारीबाग स्टेडियम में काम स्टार्ट हो गया।  सनद रहे कि हज़ारीबाग के कृषि पदाधिकारी पांच लाख का चढ़ावा देकर हज़ारीबाग़ गए है ,इसलिए उनका चुप रहना लाज़मी है। जबकि इस योजना के लिए न तो राज्यादेश  मिला है न ही टेंडर हुवा है ,जबकि दोनों प्रक्रिया ज़रूरी है ,मंत्री तथा उनके रिस्तेदारो को इस बात का बिस्वास है कि वे सभी अधिकारिओ से बैक डेट में ही सब कुछ करवा लेंगे और रही टेंडर निकलने कि बात सो अखबारो को विज्ञापन देकर मैनेज कर लिया जायेगा ,सब चुप हो जायेंगे ,पर झारखण्ड कि एक परिपाटी भी रही है कि यहाँ का जो  भी कृषी मंत्री रहा है वह देर सबेर केस में फसा है ,जेल भी गया है ,लिहाज़ा इस मंत्री के लिए भी भ्रस्टाचार के मकड़े का जाला तईयार हो रहा है।
 हज़ारीबाग़ प्रमंडल के संयुक्त कृषि निदेशक आर एन प्रसाद ने ११ फरवरी को कहा कि हमें जानकारी नहीं है कि किसने किसको काम दिया है ? कितने का काम है वैसे बिना टेंडर और राज्यादेश के काम नहीं हो सकता है अगर हो रहा है तो यह गलत है ,वही उपायुक्त सुनील कुमार से जब टेंट एसोसिएसन के लोग मिले तो उनने भी कार्य कि जानकारी से अनभिज्ञता प्रगट कि जबकि स्टेडियम का बुकिंग ज़िला प्रसासन के आदेश से ही होता है पर ११ फरवरी तक प्रसासन को कोई चिठी मिली ही नहीं।   टेंट एसोसिएसन के लोगो ने राज्यपाल सहित सभी मंत्रियो को आवेदन दिया है कि गलती को रोका जाये नहीं तो आंदोलन होगा।


कोयला तस्करी के आईने में - प्रमंडल

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             कोयला तस्करी के आईने में - प्रमंडल 


तहलका डेस्क रांची 

रांची से प्रकासित एक हिंदी दैनिक में कोयला तस्करी से जुडी खबरे प्रमुखता से  दीन प्रकासित हो रही है ,DIG मुख्यालय को रिपोर्ट भेज रही  है कि कोयला तस्करी हो रही है ,कहा कहा  यह भी ब्यौरा दिया जा रहा है। अब दोनों कार्यो कि बारीकी पर गौर फरमाईये - अखबार में वही आदमी खबर लिख रहा है जो तस्करो का दोस्त है ,पिछले सालो में उनका नाम CID रिपोर्ट तक में शुमार हो चूका है। फिर क्यों लिख रहे है क्या उन्हें कोयला तस्कर मैनेज नहीं कर रहे है ? बहुत कठीन प्रस्न है -यहाँ निज़ाम बदल गया है उसने नयी रियासत बसायी है ,तस्करो को वहा  तक पहुचाने के लिए सारी कवायद कि जा रही है ,ताकि एक लीक बन जाये जिसपर गाड़ी भले ही न चले बैलगाड़ी जरुर चलता रहे। अंग्रेज़ो के ज़माने में गाव के लोग छुलवा करते थे जानवरो को ढोल नागडा  लेकर भगाते थे और अँगरेज़ बहादूर मचान पर बैठे रहते थे, जानवर उनकी तरफ भागते थे तो उनका सिकार आसानी से होता था। यहाँ भी वही तकनीक काम कर रही है। नहीं तो जहा से हर दीन करोडो का गेम हो रहा है वहा  कि खबर क्यों नहीं छप रही है?रूंगटा जैसे बंधुओ का नाम क्यों नहीं आ रहा है ? जो तस्कर पिछले चार सालो में पूरे छेत्र का बादशाह बना बैठा है उसका नाम क्यों नहीं छापा ज़ रहा है ? इसलिए क्युकी छोटे चोर पकड़े जाये और बड़े तस्कर कि बादशाहत बरकरार रहे ,और मैनेज करने कि जगह बनी रहे। 
            दूसरी तरफ अगर DIG को पता है कि कौन प्रभारी किसके लिए काम कर रहा है तो उसे सस्पेंड क्यों नहीं कर देते है ? क्या गलत करने का प्रमाण मिलने  के बाद भी DIG को सस्पेंड करने का आधिकार नहीं है ? और लोग सिर्फ हज़ारीबाग रामगढ में अटके है ,गिरिडीह में कई डिपो ऐसे है जहा कभी भी छापामारी कर हज़ारो टन अवैध कोयला पकड़ा जा सकता है। पर यहाँ कोई छापामारी नहीं होती है। हज़ारीबाग और रामगढ में कई बार DIG कि छापामारी हुई भी है पर अब क्यों नहीं ? सिर्फ पत्र लिखना ही काम है DIG का ? यह इसलिए क्युकी हमारी ईमानदारी पर  कोई उंगली न उठाये। साँप भी मर जाये लाठी भी नहीं टूटे। DIG का हड़कम्प पूरे कोयला तस्करो पर है ,अगर चार स्थानो पर छापामारी हो जाये तो पूरे छेत्र में काम बंद हो जायेगा। कम से कम डकैती तो बंद हो ही जायेगी ,चोरी भले ही होती रहे। पर ऐसा नहीं हो रहा है। हर दीन करोडो के काले हीरे कि तस्करी हो रही है और क्या ईमानदार ,क्या बेईमान सभी के चेहरो पर प्रस्न चिन्ह लगता जा रहा है। एक दरोगा जो अभी इंस्पेक्टर है ने वेस्ट बोकारो थाना के CD PART 2 में लिखा है ,लाली मेरे लाल कि ,जीत देखो तित लाल लाली देखन मई गयी मई भी हो गयी लाल। यानि उस थाना प्रभारी ने आज से चौदह साल पहले ईमानदारी से स्वीकार किया कि मैंने कोयले कि काली कमाई खायी। अभी वह इंस्पेक्टर मुख्यालय में तैनात है। ईमानदारी में अजय भटनागर ,कुंदन कृष्णन ,शोभा ओहत्कर के बाद कोई नाम नहीं जुड़ा। इससे पहले ज्योती सिन्हा ने एक थाना प्रभारी को कोयला तस्करी करने के जुर्म में न सिर्फ सस्पेंड किया था बल्कि उसे जेल भेज दिया था। डर से इसके बाद दस साल तक किसी ने तस्करी करने कि हिम्मत नहीं कि थी। 
   








मार्केटिंग बोर्ड में खुले आम वसूली मंत्री के लिए

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                मार्केटिंग बोर्ड में खुले आम वसूली मंत्री के लिए 

                                            अधिकारी चुप्पी साधे बैठे है 

तहलका डेस्क रांची
    झारखण्ड में नेता मंत्री बड़े अधिकारी अब भ्रस्टाचार कि गंगा में या तो डुबकी लगा रहे है या फिर तैरने कि फिराक में है ,गिनती के जो  अधिकारी  ईमानदार बचे थे अब उनकी ओर  भी  उंगलिया उठाने लगी है। वाकया कृषि मंत्रालय का है। जिनके मंत्री योगेन्द्र साव है। योगेन्द्र साव पर चाहे लाख भ्रस्टाचार के मामले गुलाटी मार रहे है पर उन्हें एक ईमानदार सचिव नितिन मदन  कुलकर्णी के रूप में दिया गया था ताकि मंत्री और उनके साले कि स्वेच्छा चारिता पर लगाम लगा रहे। पर यहाँ तो सचिव महोदय आँख मूंदकर सभी फाईलो पर दस्तखत कर दे रहे है। १३ जनवरी को मार्केटंग बोर्ड कि बैठक रांची के बोर्ड में आहूत कि गयी थी सभी पदाधिकारी और सभी जिलो के सचिव पहुचे थे ,पहले से गरम कुलकर्णी साहब यहाँ नरम दिखायी दिए ,कोई लगाम लगाने कि बात नहीं हुई ,बल्कि जमशेदपूर के सचिव अशोक कुमार सिन्हा ने मीटिंग के बाद खुलेआम मंत्री और सचिव के नाम पर सभी जिलो के सचिवो से पैसा वसूला कि हर महीने मंत्री और अधिकारी को पैसा देना है।यहाँ सभी जिलो के सचिवो कि औकात के अनुसार उनकी देनदारी तय कि गयी है। सनद रहे कि जमशेदपुर के अशोक कुमार सिन्हा बोकारो के शिवजी तिवारी और गिरिडीह के बी एल रजक कलर्क होते हुवे भी सचिव पद पर काबिज़ है। जबकि चाईबासा के सचिब शशि खलखो को तीन माह में ही हटा दिया गया। जमशेदपुर के सचिव सभी अधिकारिओ पर पैसे पैरवी और कई अन्य उपहारों मनुहारों कि बदौलत हावी रहते है ,इस बार उम्मीद कि जा रही थी कि कुलकर्णी के सामने उनकी दाल नहीं गलेगी ,,पर उनने दाल यहाँ भी न सिर्फ गलाया बल्कि दाल परोस भी दिया सब देखते रह गए। और रांची कि मीटिंग में ही ८  लाख कि वसूली हो गयी  ,रांची के सचिव ने १२९ दूकान मार्केटिंग यार्ड में अनधिकृत रूप से बेच डाला ,बोर्ड में संगीता लाल को डिप्टी डाइरेक्टर रिसर्च बनाया गया है ,यह पद कलर्क का है पर श्री लाल ने पैसा कमाने के लिए यह पद भी स्वीकार कर लिया वरना कोई वज़न वाला अधिकारी कभी भी यह बर्दास्त नहीं करेगा। मार्केटिंग बोर्ड में कई अन्य अधिकारी भी है जो पैसा के अलावे अन्य साधन भी इन अधिकारिओ के लिए मुहैया करते है और पूरे विभाग में इस बात कि खुले आम चर्चा भी है पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। योगेन्द्र साव कि दबंग आदेशो के आगे सभी नतमस्तक है।

          

राजनीति का सबसे बड़ा तमाशा है राजनेताओं की रईसी

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                           राजनीति का सबसे बड़ा तमाशा है राजनेताओं की रईसी 

पुण्य प्रसून बाजपेयी 
यूपी सरकार के मंत्री विधायक बुधवार को पांच देशों के लिये रवाना हो गये और बुधवार की देर रात कर्नाटक सरकार के मंत्री विधायक तीन देशों की यात्रा कर वापस लौटे। इसी दिन केजरीवाल ने मीडिया से बात बात में कहा कि बदलाव के लिये जरुरी है कि सरकार और मंत्री अपनी बहुसंख्य जनता के जीवन जीने के तरीकों से इतर ना सोचें। यानी सादगी जरुरी है। लेकिन यूपी और कर्नाटक के मंत्री विधायकों ने अपनी यात्रा को संसदीय लोकतांत्रिक परिस्थितियों की दुहाई देकर इस सच से पल्ला झाड़ लिया कि यूपी में दंगों का दर्द बरकरार है और कर्नाटक में किसान सूखे की मार से परेशान हैं। तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का सच है क्या और क्यों लोकतंत्र का जाप करने वाली पारंपरिक राजनीति बदलने का वक्त आ गया है। इस सवाल को समझने के लिये जरा मंत्री नेताओं के आम लोगो से दूर होते सरोकार को परखें। इंग्लैंड, नीदरलैंड, टर्की, ग्रीस और यूएई की यात्रा पर गये यूपी सरकार के मंत्रियों पर कुल खर्चा डेढ़ करोड़ रुपए का है तो आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड और फिजी घूमकर लौट रहे कर्नाटक के विधायक मंत्रियो पर कुल खर्चा एक करोड़ 35 लाख रुपये का है । कमोवेश देश के हर राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में विदेशी यात्रा को ना सिर्फ महत्वपूर्ण माना गया है बल्कि सरकारी खजाने से करोड़ों लुटाने का भी अधिकार राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार और हर मंत्रालय को दिया गया है। देश के सभी 28 राज्यों के सीएम हो या मंत्री या फिर विधायकों की टोली की विदेशी यात्रा पर हर बरस खर्चा तकरीबन 775 करोड़ रुपये का है।

वहीं केन्द्र सरकार के तमाम मंत्रालय और सांसदों की टोली पर हर बरस करीब 625 करोड रुपये खर्च होता है। यानी 1400 करोड रुपये देश के राजनेताओं की विदेशी यात्रा पर खपता है। इसको अगर सिलसिलेवार तरीके से बांटे तो राज्यों के मंत्री - विधायक का स्टडी टूर खर्च--175 करोड़ का है। केन्द्र के मंत्रियो के स्टडी टूर का खर्च 200 करोड़ रुपये का है। राष्ट्रीय नेताओ की विदेशी यात्रा पर सालाना खर्च 425 करोड़ रुपये और राज्यों के नेताओं पर विदेशी यात्रा खर्च 600 करोड रुपये आता है। इसमें प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का यात्रा खर्च शामिल नहीं है। वैसे, मनमोहन सिंह ने 2004 में सत्ता संभालने के बाद 70 विदेश यात्रायें अक्टूबर 2013 तक कीं। जिस पर 650 करोड़ रुपये खर्च हुये। जाहिर है एक सवाल यहां उठ सकता है कि विदेश यात्रा करने में परेशानी क्या है और अपने ही देश में रहकर कोई क्या सुधार कर सकता है। दरअसल, आम आदमी पार्टी की बारीक राजनीति को समझें या कहें लोगों का रुझान क्यों केजरीवाल की तरफ झुका, उसका एक बडा सच देश की पूंजी पर देश का नाम लेकर अपनी रईसी को जताना-दिखाना ही हो चुका है । कांग्रेस और बीजेपी ही नहीं सपा, बसपा सरीखे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के नेता भी अपने प्रोफाइल में यह लिखना शान समझते हैं कि उन्होंने कितने देशों की यात्रा बतौर विधायक, सांसद या मंत्री के तौर पर की है।

हालांकि कोई उस मुद्दे का जिक्र नहीं करता कि किस मुद्दे के आसरे उसने जनता के पैसे पर सरकारी यात्रा की। क्योंकि बीते 20 बरस नेताओं और मंत्रियों ने देश के हर उस मुद्दे को लेकर विदेश की यात्रा की, जिससे देश में सुधार किया जा सके। इस पर करीब देश का करीब 20 लाख करोड़ खर्च हो गया और तमाम मुद्दों का बंटाधार भी इसी दौर में हुआ। सिर्फ शिक्षा, स्वास्थ्य, पीने का पानी,सौर उर्जा और सिंचाई व्यवस्था दुरुस्त करने को लेकर सबसे ज्यादा यात्राएं विदेश की हुई और संयोग देखिये इन्हीं मुद्दों को लेकर आम आदमी पार्टी सत्ता में आयी। यही मुद्दे हर राजनीतिक एलान के केन्द्र में रहे। लेकिन न मुद्दों पर विदेशी यात्रा में देश का करीब 4 लाख करोड रुपया खर्च हो गया ।

दरअसल, देश में चुनी हुई सरकारो के खिलाफ आम आदमी की राजनीति में दखल देने की असल दस्तक यही से शुरु होती है। और ध्यान दें तो केजरीवाल ने जनता की भागेदारी से राजनीति करने के तौर तरीको से उसी गुस्से को राजनीतिक तौर पर जगह दी है जो अभी तक हाशिये पर थी। मुज्जफरनगर दंगों के दर्द को निपटाये बगैर सरकार के मंत्री विदेश नहीं जा सकते यह आवाज यूपी में नहीं उठेगी। लेकिन दिल्ली में किसी आम आदमी को कोई परेशानी है तो उसकी जिम्मेदारी लेने के लिये दिल्ली के सीएम केजरीवाल तैयार हैं। तो सवाल तीन हैं। पहला, क्या सत्ताधारियो की रईसों पर लगाम खुद सत्ताधारियों को ही लगानी होगी। दूसरा, राजनीति के तौर तरीके आम आदमी से जुडेंगे तो सत्ता रईसी नहीं करेगी। तीसरा, क्या लोकतांत्रिक तौर तरीके सत्ता को बदलने पर मजबूर कर देंगे। यानी दिल्ली चुनाव परिणाम आने के बाद जिस तरह राहुल गांधी ने खुली पंचायत शुरु की और परिणामों के तुरंत बाद कहा कि वह साल भर पुरानी पार्टी से भी सिखेंगे। इसका मतलब निकाला क्या जाये? क्या वाकई आने वाले दौर में सत्ताधारी जनता के दर्द से जुडेंगे। या जनता के दर्द को दूर करने के तरीके जानने के लिये स्टडी टूर का बहाना निकाल कर विदेश की सैर पर निकल जायेंगे। असल में परंपारिक राजनीति का सियासी मिजाज बदल इसीलिये रहा है क्योंकि सत्ताधारी ने कोई सरोकार आम आदमी से रखा नहीं है। इसीलिये हर तरफ इग्लैंड, नीदरलैंड, टर्की, ग्रीस और और यूएई की चकाचौंध हैं। मस्ती से भरपूर समाज है। गरीबी मुफलिसी से दूर विकसित देश की संसदीय राजनीति का गुदगुदापन है। और दूसरी तरफ यूपी की त्रासदी। दंगों से प्रभावित मुज्जफरनगर का रुदन है। कर्नाटक का बेहाल किसान है। इन दो चेहरों को क्या एक साथ देखा जा सकता है।

एक तरफ खाता पीता समाज है। दूसरी तरफ भूख है। एक तरफ अधिकतम पाने की चाहत है तो दूसरी तरफ न्यूनतम के जुगाड़ की चाहत। कोई मेल नहीं है और मेल हो जाये इसके लिये भारतीय समाज उसी राजनीतिक सत्ता पर निर्भर है जो सत्ता चकाचौंध की राजनीति पर भी भारी है। तो कैसे सत्ता की उस रईसी को लोकतंत्र के राग से जोड़ा जा सकता है, जो मंत्री से लेकर संतरी तक अभी तक गुनगुनाते रहे। कैसे माना जाये कि 18 दिनों तक चार्टेड विमान से पांच देशो के 17 पर्यटक स्थानों की सैर के बीच यूपी सरकार के मंत्री स्टडी करेंगे कि कैसे संसदीय राजनीति को मजबूत किया जा सकता है। कैसे गरीबी, मुफलिसी वाले समाज को चकाचौंध में बदला जा सकता है। ऐसे में यह सवाल कौन उठायेगा कि मुज्जफरनगर के राहत कैंपों में डेढ़ सौ रुपये का कंबल तक नहीं है। यह सवाल कौन करेगा कि अंग्रेजी का विरोध करने वाले मुलायम सिंह यादव की सरकार के मंत्री स्टडी टूर के लिये इग्लैंड क्यों जा रहे हैं। और सवाल यह भी कोई नहीं करेगा कि जिस दौर में यूपी को सरकार की सबसे ज्यादा जरुरत है उसी दौर में यूपी के 9 मंत्री 18 दिनो तक दुनिया की सैर पर निकल गये। तो 2014 का चुनाव इस राजनीति में सेंघ लगायेगा या नहीं। इसका इंतजार कीजिये।

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